Sunday, 1 February 2026

India Budget 2026 vs Other Major Nations

India Budget Comparison: FY 2025–26 vs FY 2026–27

FY 2025 -26
Period: 1 April 2025 – 31 March 2026
Income: ~₹30–31 lakh crore
Expenditure: ~₹47–48 lakh crore
Fiscal Deficit: ~₹16–17 lakh crore
Deficit Ratio: ~4.5–4.9% of GDP
Capex: ~₹11.5–12 lakh crore

FY 2026–27
2026-27 Budget Estimate
Net Tax Receipts
~₹28.7 lakh crore
Total Expenditure
₹53.5 lakh crore (≈$650 billion+)
Fiscal Deficit (% of GDP)
4.3 %
Debt-to-GDP (Centre)
~55.6%

Monday, 19 January 2026

250 साल बाद - केरल कुंभ मेला 2026: निला (भरतपुझा) के तट पर 'महामघ महोत्सवाम' की भव्य वापसी

​केरल की आध्यात्मिक और सांस्कृतिक विरासत के इतिहास में वर्ष 2026 एक स्वर्णिम अध्याय लिखने जा रहा है। लगभग 250 वर्षों के लंबे अंतराल के बाद, केरल अपनी खोई हुई प्राचीन परंपरा 'महामघ महोत्सवाम' को पुनर्जीवित करने के लिए तैयार है।

​इसे "केरल का कुंभ मेला" कहा जा रहा है, जो 18 जनवरी से 3 फरवरी 2026 तक पवित्र भरतपुझा नदी के तट पर आयोजित होगा। प्राचीन काल में यह उत्सव मामांकम के नाम से जाना जाता था।

इस महान परंपरा को पुनर्जीवित करने का संकल्प जूना अखाड़ा ने लिया है। जूना अखाड़े के वरिष्ठ संत और दक्षिण भारत के महामंडलेश्वर स्वामी आनंदवन भारती महाराज के प्रयासों से इसे एक बार फिर उसी भव्यता के साथ आयोजित किया जा रहा है।

​केरल का कुंभ मेला असल में 'महामघ महोत्सवाम' का ही आधुनिक स्वरूप है। यह 12 साल में एक बार आने वाला महापर्व है, जिसका सीधा संबंध प्राचीन 'मामांकम' (Mamankam) उत्सव से है। उत्तर भारत के कुंभ मेले की तरह ही, इस पर्व का मुख्य केंद्र माघ महीने के दौरान पवित्र नदी में 'शाही स्नान' है।

​आयोजन का समय और स्थान
​तिथि: 18 जनवरी – 3 फरवरी, 2026 (17 दिवसीय उत्सव)

​स्थान: तिरुनावया, मलप्पुरम जिला, केरल।

​नदी: भरतपुझा (जिसे 'दक्षिण गंगा' भी कहा जाता है)।

​पौराणिक कथा और महत्व: भगवान परशुराम का पहला यज्ञ - ​मान्यता है कि केरल के रचयिता भगवान परशुराम ने लोक कल्याण के लिए भरतपुझा के तट पर (वर्तमान थवनूर) पहला यज्ञ किया था। ब्रह्मा जी के मार्गदर्शन में हुए इस यज्ञ में सभी देवताओं ने शिरकत की थी। कहा जाता है कि माघ मास के दौरान दुनिया की सात पवित्र नदियां आध्यात्मिक रूप से भरतपुझा में समाहित हो जाती हैं, जिससे यहाँ स्नान करना कुंभ स्नान के समान पुण्यकारी माना जाता है।

​प्राचीन काल में यह उत्सव मामांकम के नाम से जाना जाता था। यह केवल एक धार्मिक आयोजन नहीं, बल्कि ज्ञान, कला और शक्ति का संगम था:


​यहाँ विद्वानों के बीच दर्शन और विज्ञान पर शास्त्रार्थ होते थे। कलारीपयट्टू (युद्ध कला) और अन्य सांस्कृतिक कलाओं का प्रदर्शन होता था। ​व्यापारिक मेलों का आयोजन होता था और अगले 12 वर्षों के लिए शासकों का चुनाव होता था। दुर्भाग्यवश, क्षेत्रीय राजाओं (वल्लुवनाडु और कालीकट के ज़मोरिन) के बीच बढ़ते संघर्षों और युद्धों के कारण यह उत्सव खूनी संघर्ष में बदल गया और लगभग 250 साल पहले बंद हो गया।

​उत्सव के मुख्य आकर्षण और रस्में
​भव्य रथ यात्रा: 19 जनवरी को तमिलनाडु की तिरुमूर्ति पहाड़ियों से एक रथ यात्रा शुरू होगी, जो 22 जनवरी को तिरुनावया पहुँचेगी।

​धर्मध्वज आरोहण: 22 जनवरी को पवित्र ध्वज फहराने के साथ मुख्य अनुष्ठानों की शुरुआत होगी।

​निला आरती: हर शाम पवित्र भरतपुझा नदी की 'निला आरती' की जाएगी।

​शहीदों को नमन: उत्सव की शुरुआत उन योद्धाओं की आत्मा की शांति के लिए प्रार्थना से होगी, जिन्होंने प्राचीन काल में मामांकम के दौरान अपने प्राण त्यागे थे।

​महत्वपूर्ण शाही स्नान की तिथियां
​इस 17 दिवसीय मेले में कई शुभ अवसर आएंगे, जिनमें स्नान का विशेष महत्व है:
​मौनी अमावस्या
​वसंत पंचमी
​रथसप्तमी
​गणेश जयंती
​भीष्म अष्टमी
​माघ पूर्णिमा

​केरल कुंभ मेला 2026 केवल एक उत्सव नहीं, बल्कि केरल की अपनी सभ्यता और गौरव को पुनः प्राप्त करने का एक अभियान है। यह उत्तर भारतीय कुंभ की नकल नहीं, बल्कि दक्षिण भारत की अपनी 'सनातन' जड़ों की ओर लौटने का एक मार्ग है।

केरल कुंभ मेला 2026 (महामघ महोत्सवाम) में शामिल होने के लिए तिरुनावया (मलप्पुरम जिला) पहुँचना काफी आसान है। यह स्थान सड़क, रेल और हवाई मार्ग से अच्छी तरह जुड़ा हुआ है।

1. हवाई मार्ग द्वारा (By Air)

अगर आप विमान से आ रहे हैं, तो निकटतम हवाई अड्डा कोझिकोड (Calicut International Airport - CCJ) है।

दूरी: हवाई अड्डे से तिरुनावया की दूरी लगभग 36 से 42 किमी है।

आगे का रास्ता: एयरपोर्ट से आप टैक्सी या बस के जरिए तिरुनावया पहुँच सकते हैं। टैक्सी से लगभग 1 घंटा लगता है।

विकल्प: कोच्चि (Cochin International Airport) भी एक विकल्प है, जो यहाँ से लगभग 115 किमी दूर है।

2. रेल मार्ग द्वारा (By Train)

ट्रेन से यात्रा करना सबसे सुविधाजनक है क्योंकि तिरुनावया का अपना रेलवे स्टेशन है।

निकटतम स्टेशन: * तिरुनावया (Thirunavaya - TUA): यह मंदिर से मात्र 1.5 से 2 किमी की दूरी पर है। यहाँ से आप ऑटो-रिक्शा लेकर सीधे आयोजन स्थल पहुँच सकते हैं।

तिरुपुर (Tirur - TIR): यदि आपकी ट्रेन तिरुनावया में नहीं रुकती, तो तिरुपुर प्रमुख रेलवे स्टेशन है, जो लगभग 8 से 11 किमी दूर है। तिरुपुर से मंदिर के लिए लगातार बसें और टैक्सियाँ उपलब्ध हैं।

कुट्टिप्पुरम (Kuttippuram - KTU): यह भी पास का स्टेशन है (लगभग 8 किमी दूर)।

3. सड़क मार्ग द्वारा (By Road)

केरल का सड़क नेटवर्क बहुत मजबूत है। आप केरल राज्य परिवहन (KSRTC) या निजी बसों से आसानी से पहुँच सकते हैं।

बस सेवा: कुंभ मेले के दौरान केरल सरकार 100 से अधिक विशेष KSRTC बसें चला रही है। ये बसें मलप्पुरम, तिरुपुर, कुट्टिप्पुरम और कोझिकोड जैसे प्रमुख शहरों से उपलब्ध होंगी।

प्रमुख मार्ग: यह स्थान NH 66 के करीब है। तिरुपुर-कुट्टिप्पुरम रोड (Tirur-Kuttippuram Road) सीधे मंदिर की ओर जाती है।

दर्शन के लिए विशेष 'पिलग्रिम रूट' (सुझाव):

श्रद्धालुओं के लिए एक आदर्श मार्ग इस प्रकार हो सकता है:

सबसे पहले कादम्पुझा भगवती मंदिर (Kadampuzha Bhagavathi Temple) के दर्शन करें।

फिर चंदनकावु भगवती मंदिर जाएँ।

इसके बाद तिरुनावया नवमुकुंदा मंदिर पहुँचें (जहाँ कुंभ मेला आयोजित है)।

शाम को निला आरती (भरतपुझा नदी की आरती) में शामिल हों, जो सबसे मुख्य आकर्षण है।

यात्री सुझाव:

भीड़ का ध्यान रखें: कुंभ मेले के दौरान यहाँ लाखों लोगों के आने की संभावना है, इसलिए अपनी ट्रेन या होटल बुकिंग पहले से कर लें।

निकटतम शहर: ठहरने के लिए आप तिरुपुर (Tirur) या कुट्टिप्पुरम (Kuttippuram) में होटल देख सकते हैं, क्योंकि तिरुनावया एक छोटा गाँव है।

पार्किंग: यदि आप अपनी कार से जा रहे हैं, तो प्रशासन द्वारा बनाए गए निर्धारित पार्किंग जोन का ही उपयोग करें क्योंकि नदी के किनारे ट्रैफिक प्रतिबंधित हो सकता है।

Saturday, 17 January 2026

गायत्री और विभिन्न उप गायत्री मंत्रें

गायत्री मंत्र का जप अत्यन्त श्रेष्ठ माना गया है। यह कोई भी गायत्री मंत्र हो, उसका जप कल्याणकारी होता है। ‘गायत्री’ शब्द का अर्थ है — गायन्तं त्रायते, अर्थात् जो जप करने वाले की रक्षा करे।

गायत्री मंत्र को मंत्रों की माता कहा गया है। वेदों में इससे श्रेष्ठ कोई मंत्र नहीं माना गया। यह सूर्य (सविता) देव की उपासना का दिव्य मंत्र है, जो बुद्धि, प्रज्ञा और आत्मशक्ति को जाग्रत करता है।

वास्तव में हम जो मंत्र जपते हैं, वह सावित्री मंत्र है। वास्तविक गायत्री मंत्र को अत्यन्त गोपनीय रूप से सुरक्षित रखा गया है। मैं स्वयं भी उस मंत्र को प्राप्त करने का प्रयास कर रहा हूँ, लेकिन उसके बारे में किसी को भी विशेष जानकारी नहीं है। वास्तविक गायत्री मंत्र का जप सामान्य लोगों के लिए एक दिन में 9 बार भी करना संभव नहीं है। इतना जप करते ही शरीर का ताप अत्यधिक बढ़ जाता है और जप करने वाला व्यक्ति बीमार पड़ जाता है।

मुझे याद है कि मैंने एक किताब में (Aghora, लेखक: Dr. Robert E. Svoboda) पढ़ा था कि महाराष्ट्र में एक साधक 108 बार मंत्र जप करता है, और शरीर की अत्यधिक गर्मी के कारण वह पानी में डूबकर पड़ा रहता है, लेकिन इसके बावजूद अगले दिन उसकी मृत्यु हो जाती है। 

अघोर के मुख्य पात्र विमलानंदजी बताते हैं कि वह रहस्यमयी गायत्री मंत्र किसी भी लिखित रूप में उपलब्ध नहीं है। गायत्री मंत्र का एक ऐसा गुप्त स्तर (रहस्यमय लेयर) वे हमारे सामने खोलते हैं, जिसे हम सामान्यतः नहीं जानते। रहस्य गायत्री, महा गायत्री, शक्ति गायत्री — ये केवल शब्द नहीं हैं, बल्कि प्राणशक्ति को जाग्रत करने वाली शक्तिशाली कंपनाएँ (शाक्तिक वाइब्रेशन) हैं।

विमलानंदजी कहते हैं कि इसका रहस्य केवल शब्दों में नहीं पाया जा सकता। हम जो गायत्री या सावित्री मंत्र जपते हैं, वे पूरी तरह सुरक्षित हैं; वे दिव्य चेतना और मानसिक शांति प्रदान करते हैं। लेकिन तांत्रिक स्वरूप — महा, गुप्ता और शक्ति — यदि गुरु की कृपा और दीक्षा के बिना जपे जाएँ, तो प्राणशक्ति में असंतुलन उत्पन्न हो सकता है। इसके परिणामस्वरूप अस्वस्थता, शरीर में अधिक गर्मी, अनिद्रा जैसी समस्याएँ उत्पन्न हो सकती हैं। “ओरिजिनल गायत्री” शब्दों में नहीं, बल्कि अनुभव में स्थित है।

इसी को अजप गायत्री कहा जाता है — जहाँ हम मंत्र का जप करते हुए भी, वह मंत्र आत्मा के भीतर स्वतः प्रवाहित होता रहता है।

और अधिक क्या कहूँ, जब मैंने स्वयं एक दिन में 30 माला सावित्री मंत्र, अर्थात् 3240 बार जप किया, तब असहनीय रूप से शरीर का ताप बढ़ गया। इसे नज़रअंदाज़ करके जब मैंने अगले तीन दिनों तक लगातार उतनी ही संख्या में जप किया, तो परिणामस्वरूप मैं लगभग एक महीने तक बीमार पड़ा रहा।

दिन का पहला गायत्री मंत्र बोलने से पहले ऋषि–छन्दस्–देवता न्यास करना जरूरी है। उसकेलिए पहले
मृगमुद्रा (पहले मध्यमा और अनामिका उँगलियों को जोड़कर पकड़ें, उनकी दूसरी संधि पर अंगूठे से स्पर्श करते हुए अन्य उँगलियों को ऊपर उठाकर रखें)
के साथ शिर पर स्पर्श करके “ॐ गाथिनो विश्वामित्र ऋषि” तथा नाक के नीचे स्पर्श करके “गायत्री छन्दः” और हृदय पर स्पर्श करके “सविता देवता” का जप करें।
(इसे ऋषि–छन्दस्–देवता न्यास कहते हैं।) इसके पश्चात गायत्री मंत्र का तीन बार जप करें।

ॐ भूर्भुवः स्वः
तत् सवितुर्वरेण्यं
भर्गो देवस्य धीमहि
धियो यो नः प्रचोदयात् ।।

अर्थ
हम उस सर्वव्यापी, सर्वशक्तिमान्, अज्ञान और अंधकार को नष्ट करने वाले सविता (सूर्यदेव) के श्रेष्ठ दिव्य तेज का ध्यान करते हैं।
वह दिव्य प्रकाश हमारी बुद्धि (धि) को प्रेरित करे, शुद्ध करे और सन्मार्ग पर प्रवृत्त करे।
सरल भावार्थ
हे परम प्रकाश!
आप हमारी बुद्धि को जाग्रत करें,
सही–गलत का विवेक दें
और हमें सद्कर्म एवं सत्य के पथ पर चलने की प्रेरणा दें।

गायत्री मंत्र-शक्तिशाली, दैवीय मंत्र

गायत्री छन्दस्-यह मंत्र लिखा हुआ ताल

गायत्री एक मंत्र है, लेकिन यह गायत्री छन्दस् में रचित है

इस मंत्र के श्लोक की जो ताल (छन्द) होती है, उसे गायत्री छन्दः कहा जाता है। गायत्री छन्द में 24 अक्षरों वाला एक मीटर पाया जाता है, जो 3 पादों में विभक्त होता है, और प्रत्येक पाद में 8–8 अक्षर होते हैं।

इसलिए, गायत्री मंत्र एक मंत्र है, लेकिन उसकी संरचना या ताल गायत्री छन्द में है।

मंत्र शक्ति के स्रोत हैं। मनस् को त्राणन करने वाला है। जो मन का त्राण (रक्षा) करे। सभी मंत्रों की माता गायत्री मंत्र है। अर्थात् मंत्रों में गायत्री से श्रेष्ठ कोई दूसरा नहीं है। इसे सूर्यदेव से की गई प्रार्थना के रूप में माना जाता है, फिर भी इसके महान प्रेरणादायी स्वर इस मंत्र को विशिष्ट बनाते हैं।

इस मंत्र के प्रत्येक अक्षर के लिए अलग-अलग शक्ति देवताएँ मानी गई हैं।

1. आदिपराशक्ति 
2. ब्राह्मी 
3. वैष्णवी
4. शांभवी 
5. वेदमाता 
6. देव माता
7. विश्रमाता 
8. मतंभर 
9. मन्दाकिनी
10. अपज 
11. ऋषि
12. सिद्धि
13. सावित्रि 
14. सरस्वती
15. लक्ष्मी
16. दुर्ग 
17. कुण्डलिनी 
18. प्रजानि
19. भवानी 
20. भुवनेश्वरी 
21. अन्नपूर्णा 
22. महामाया 
23. पयस्विनी 
24. त्रिपुर।

वेदों की माता है गायत्री। गायत्री मंत्र से बेहतर मंत्र नहीं। सविताव है गायत्री मंत्र की अधिदेवता, विश्‍वामित्र ऋषि। त्रिपुरदहन काल में भगवान् श्रीपरमेश्‍वर के रथ के ऊपर चरट के रूप में जपकर बंधा हुआ है गायत्री मंत्र। “गान करने वाले को त्राणन” करने वाला है गायत्री शब्द का अर्थ। ऋग्वेद, यजुर्वेद, सामवेद इन तीन वेदों में भी सामान्य रूप से देखा जाने वाला मंत्र गायत्री मंत्र की विशेषता है। मंत्र की अधिष्ठात्री देवी पञ्चमुखी और दशहस्ता है। तेजस्, यशस्, वचस् इन तीन शक्तियों का संयोग ऊर्जा स्रोत है गायत्री। यह सम्पूर्ण ब्रह्मांड में व्याप्त शक्ति है। गायत्री मंत्र उच्चारण करने पर ये तीन शक्तियां हमें अनुग्रह प्रदान करती हैं। इसमें स्वर प्रदान करने वाला प्राण प्रवाह हमारी बुद्धि शक्ति बढ़ाएगा। बुद्धि शक्ति के बिना किसी को सफलता नहीं मिल सकती। बुद्धि शक्ति के माध्यम से ही आत्म शक्ति बढ़ाई जा सकती है।

बुद्धि शक्ति बढ़ाने के साथ ही , मनश् शक्ति से बाधाएं दूर करने के लिए, आपत्ति कालों से संरक्षण के लिए, अज्ञानता नाश करने के लिए, चिन्तन को शुद्ध करने के लिए, आशय विमय पाटव बढ़ाने के लिए गायत्री मंत्रोपासना उत्तम है।
संक्षेप में मंत्रों में सर्वोत्तम गायत्री मंत्र है।

गायत्री मंत्र के प्रत्येक शब्द शरीर को अधिक ऊर्जा प्रदान करने के ढंग से व्यवस्थित हैं। इस महामंत्र के अक्षर मनुष्य शरीर के ग्रन्थियों को आपस में जोड़ते हैं। नित्य जप करने से मोक्ष दायक है।
दोष प्रभावित न होने के लिए यह जप सहायक है।
गायत्री मंत्र जप स्वास्थ्य, दीर्घायु और अभिवृद्धि प्रदान करता है।

सामान्यतः प्रभात संध्या और प्रदोष संध्या को गायत्री जपना चाहिए। सुबह पूर्व या उत्तर मुख और संध्या को पश्चिम या उत्तर मुंह करके और अन्य समयों में उत्तर मुख करके गायत्री जपें। रात्रि जप नहीं करना चाहिए। खड़े होकर या बैठकर जपें। स्नानानन्तर जप सर्वोत्तम। अन्यथा दन्त शुद्धि कर मुख और हाथ पैर धोकर जपें। अच्छे योग कक्ष को गायत्री जप के लिए देखा जा सकता है। इतनी बार गायत्री जपने पर कुछ सिद्धियां होती हैं ऐसा विश्वास है।

यह महामंत्र दिन में एक बार जपने पर भी उस दिन किए दोष कर्म फलों को नष्ट कर देता है। एकाग्रता से दस बार जपने पर एक मास के दोष कर्म फल और हजार बार बोलने पर एक वर्ष के दोष कर्म फल शांत होते हैं ऐसा विश्वास है। मनःशुद्धि और मनोबल बढ़ाने के साथ प्रत्येक व्यक्ति में पॉजिटिव प्राणिक ऊर्जा भरने और उसके माध्यम से ऐश्वर्य बढ़ाने में गायत्री मंत्र सक्षम है।

ॐ – परब्रह्म को संकेत करने वाला पुण्य शब्द,
भूः – भूमि
भुवः – अन्तरिक्ष
स्वः – स्वर्ग
तत् – वह
सवितुः – सविताव का (सूर्य का)
वरेण्यं – श्रेष्ठ
भर्गः – ऊर्जा प्रवाह प्रकाश
देवस्य – दैवीय
धीमहि – हम ध्यान करते हैं
यः – जो
नः – हमारा (हम लोगों का)
धियः – बुद्धियों को
प्रचोदयात् – प्रेरित करे।

(सर्वव्यापी, सर्वशक्तिमान्, अंधकार नाशक सविताव या सूर्य के श्रेष्ठ दिव्य ज्योतिस् को हम ध्यान करते हैं। वह ज्योतिस् हमारी बुद्धि और कार्यों को प्रेरित करे।)

प्रार्थना करके कोई देवता कोई वर देगा ऐसा नहीं समझना चाहिए, प्राण शक्ति से इच्छा शक्ति को, और उसके माध्यम से क्रिया शक्ति को प्रेरित करता है गायत्री मंत्र।

इस मंत्र को स्पष्ट और त्रुटि रहित जपना चाहिए। गायत्री मंत्र निरन्तर जपने पर मनःशुद्धि और मनोबल बढ़ेगा। शरीर का बल बढ़ेगा। अपरिमित स्मृति शक्ति भी प्राप्त होगी। गायत्री मंत्र जपते समय किसी भी इष्ट देवता को ध्यान कर सकते हैं। गायत्री शक्ति वशीकरण के लिए मंत्र के रूप में कई लोग इसे मानते हैं। लेकिन किसी को भी किसी भी ईश्वर रूप को ध्यान करके गायत्री मंत्र जप सकते हैं। एकाग्रता से गायत्री मंत्र जपने पर जीवन में सर्व नन्माए आ जाएंगी।

गायत्री मंत्र अष्टाक्षर युक्त तीन पदों से युक्त है। अर्थात् गायत्री मंत्र में इक्कीस अक्षर हैं।
तत् सवितुर् वरेण्यं (8 अक्षर )
भर्गो देवस्य धीमहि (8 अक्षर)
धियो यो नः प्रचोदयात् ( 8 अक्षर)

आयातु वरदा देवी अक्षरे ब्रह्मवादिनी ।
गायत्री छन्दसां माता ब्रह्मायै ते नमोऽस्तुते ॥

(वर प्रदान करने वाली देवी को, अक्षर स्वरूपिणी को, ब्रह्म ज्ञान प्रदान करने वाली को,
छन्दसों की माता गायत्री देवी को, ब्रह्मा की जननी को,
तुम्हें नमस्कार।
अथर्ववेद मंत्र (19/71/1))

ॐ स्तुता मया वरदा वेदमाता प्रचोदयन्तां पावमानी द्विजानां ।
आयुः प्राणं प्रजां पशुं कीर्तिं द्रविणं ब्रह्मवर्चसम् ।
मह्यम् दत्वा व्रजत ब्रह्मलोकम् ॥

(द्विजों को (ब्राह्मण आदि को) शुद्ध करने वाली, वर प्रदान करने वाली
वेदमाता गायत्री को मैं स्तुत कर रहा हूं।
तुम भी उसके महत्त्व को प्रचारित करो, अन्यों को प्रेरित करो।
वह आयु, प्राण शक्ति, सन्तति, सम्पत्ति, कीर्ति,
धन, ब्रह्म तेजस् प्रदान करने वाली है।
इन्हें सब मुझे देकर तुम ब्रह्म लोक को प्राप्त हो।)

आचमन मंत्र
वैष्णव परंपरा (सामान्य गृहस्थ, जप-साधना)
आपने लिखा:

वैदिक (श्रौत/स्मार्त) आचमन

“ॐ शं नो देवीरभिष्टय
आपो भवन्तु पीतये
शं योरभि श्रवन्तु”

मंदिर, अभिषेक, पुण्याह, दीक्षा, होम आदि में प्रयुक्त होता है।

भस्म धारण से पूर्व — 

ॐ आपो हि ष्ठा मयोभुवः
ता न ऊर्जे दधातन
महे रणाय चक्षसे

ॐ यो वः शिवतमो रसः
तस्य भाजयतेह नः
उशतीरिव मातरः

(यहाँ वशिवतमोरतस्य → वः शिवतमो रसः)
(3)
ॐ तस्मा अरं गमाम वो
यस्य क्षयाय जिन्वथ
आपो जनयथा च नः
(आपका अर्थ और प्रयोग सही है, केवल संधि शुद्धि की गई है)

प्रार्थना विधि
पहले आचमन करें
दाएं हाथ में जल लेकर ॐ अच्युताय नमः कहकर जल पिएं। फिर जल लेकर ॐ अनन्ताय नमः कहकर जल पिएं फिर ॐ गोविन्दाय नमः कहकर जल पिएं आन्तरिक शुद्धि और कंठ शुद्धि के लिए आचमन करते हैं। ईश्वर नाम जपकर आचमन करने से आन्तरिक शुद्धि आती है ऐसा ऋषीश्वर कहते हैं। कोई भी प्रकार का नाम जप हो सकता है। कुछ केशवाय स्वाहा, नारायणाय स्वाहा, माधवाय स्वाहा कहकर जपते हैं। ये भी समान रूप से वैध हैं। ऋषियों ने स्पष्ट कहा है:
नामभेदे न दोषः — नाम बदलने से दोष नहीं होता।

“ॐ शं नो देवीरभिष्टय
आपो भवन्तु पीतये
शं योरभि श्रवन्तु”

कहकर आचमन करते हैं।

आचमन के बाद भस्म धारण करें। स्नान के बाद ठंडा होने वाले शरीर को विशेषकर संधि बन्धों को अत्यधिक जलांश से बचाने के लिए भस्म धारण करते हैं। भस्म धारण से शरीर को उणरव और उन्मेष प्राप्त होता है। साथ ही मनस् को आध्यात्मिक अनुभूति भी प्राप्त होती है। इसलिए भस्म धारण अनिवार्य है। प्रभात में भस्म जल में घोलकर और संध्या को जल रहित भस्म धारण करें। भस्म धारण ईश्वरीय नाम स्मरण के साथ आचार्य ने व्यवस्था की है। इसके विवरण नीचे दिए हैं।
पहले बाएं हाथ के तलवे में आवश्यक भस्म लेकर दाएं हाथ में थोड़ा जल लेकर

1. ॐ आपो हि ष्ठा मयोभुवः
ता न ऊर्जे दधातन
महे रणाय चक्षसे

(अप् देवीमारो सुखदायिनी हो। अप्रकार से बहने वाली तुम्हें हमें अन्नादि उपभोग्य वस्तुएं प्रदान करो। हमें अविकल दृष्टि शक्ति और समीचीन ज्ञान दो। तुम हमें ऐश्वर्य आदि सुख अनुभवों और उत्कृष्ट ज्ञान सम्पादन के योग्य बनाओ!)

2. ॐ यो वः शिवतमो रसः
तस्य भाजयतेह नः
उशतीरिव मातरः

(हे अप् देवीमरो तुम्हारा नैसर्गिक रस अत्यन्त सुखकर है। वह रस इस लोक में ही हमें अनुभव वेद्य बनाओ। सन्तान सुख समृद्धि की इच्छुक जननिकाएं स्नेह स्नुत पयोधरकाएं किस प्रकार अपनी शिशुओं को स्तन्य देती हैं उसी प्रकार उन्मेषकर जल रस हमें प्रदान करो)

3. ॐ तस्मा अरं गमाम वो
यस्य क्षयाय जिन्वथ
आपो जनयथा च नः

इन्हें तीन बार जप कर
जल भस्म पर छिड़कना
शरीर पर छिड़कना — पूर्णतः शास्त्रीय है

भस्म धारण मंत्र (पञ्चभूत-भावना)
फिर आवश्यक जल मिलाकर दाएं हाथ की मोतिरविरल को भस्म में छूकर नीचे कहे मंत्र को जपें
ॐ अग्निरिति भस्म
वायुरिति भस्म
जलमिति भस्म
स्थलमिति भस्म
व्योमेति भस्म
सर्वं हवीरिदं भस्म
मना एतानि चक्षूंषि भस्मानि

(हे अप् देवीमरो विभिन्न पापों के क्षय के लिए हमें तुम्हें शीघ्र प्राप्ति हो। पवित्र और पाप नाशिनी गंगा आदि नदियों में स्नान तर्पण आदि से हम पाप विमुक्त हो जाएं।)

ॐ त्र्यम्बकं यजामहे
सुगन्धिं पुष्टि वर्धनम्
उर्वारुकमिव बन्धनात्
मृत्योर्मुक्षीय मामृतात्

यह मंत्र मृत्युंजय मंत्र कहलाता है। रुद्र की पूजा के लिए अत्यन्त विशिष्ट मंत्र है। नित्य अनुष्ठान करने से ही ईश्वर पूजा का अवसर प्रदान करने के ढंग से आचार्यों ने रूपकल्पना की है। फिर दोनों हाथ जोड़कर भस्म अच्छी तरह घोलें। तर्जिमा, मध्यमा और अनामिका उंगलियां मात्र जोड़कर पकड़ें

ॐ नम  शिवाय:

कहकर नेत्ति, कंठ, हृदय, बाहर दाएं और बाएं, दाएं किनारे बाएं किनारे, दायें हाथ की कलाई, बाएं हाथ की कलाई, पेट के दोनों ओर, शरीर की संधियों पर भस्म धारण करें। भस्म धारण के बाद चंदन और सिंदूर लगाएं।

भस्म धारण के बाद गायत्री मंत्र ऋषि छन्दस् देवता न्यासों के साथ तीन बार जपें। दिन का पहला गायत्री मंत्र बोलने से पहले ऋषि–छन्दस्–देवता न्यास करना जरूरी है। उसकेलिए पहले मृगमुद्रा (पहले मध्यमा और अनामिका उँगलियों को जोड़कर पकड़ें, उनकी दूसरी संधि पर अंगूठे से स्पर्श करते हुए अन्य उँगलियों को ऊपर उठाकर रखें) के साथ शिर पर स्पर्श करके “ॐ गाथिनो विश्वामित्र ऋषि” तथा नाक के नीचे स्पर्श करके “गायत्री छन्दः” और हृदय पर स्पर्श करके “सविता देवता” का जप करें।
(इसे ऋषि–छन्दस्–देवता न्यास कहते हैं।) इसके पश्चात गायत्री मंत्र का तीन बार जप करें।

ॐ भूर्भुवस्व:
तत् सवितुर् वरेण्यं
भर्गो देवस्य धीमहि
धियो यो नः प्रचोदयात्

(जो हमारी धियों को प्रेरण करने वाला है वह देव सविताव का वरेण्य भर्गस् को हम ध्या‍न करते हैं)

अब तर्पण करें। दोनों हाथ के तलुओं में जल भरकर अंगुल अग्र भाग से जल बहाएं। इस प्रकार तीन बार बहाएं। प्रत्येक बार बहाते समय 'देवा तर्पयामि' कहें। अब 'देवगणान् तर्पयामि' कहकर फिर तीन बार बहाएं। फिर हाथ में जल लेकर तीन बार ' ऋषी तर्पयामि' और तीन बार 'ऋषीगणान् तर्पयामि' कहकर दोनों हाथों के बीच से बहाएं। फिर हाथ में जल लेकर तर्जनी और अंगूठा के बीच से तीन बार पितॄन् तर्पयामि और तीन बार पितृ गणान् तर्पयामि बहाएं फिर दाएं हाथ में जल लेकर ॐ भूर्भुवस्वॐ कहकर सिर के ऊपर घुमाकर बहाएं। फिर आचमन करें। फिर ध्या‍न, प्रार्थना, जप करें। उसके बाद मंदिर दर्शन करें।

मंदिर दर्शन के बाद ही प्रभात भोजन करें। फिर पौधों को पानी डालें। उसके बाद परिवार जनों से कुशल प्रश्न करें। फिर उनके कार्यों को जाएं। कार्य करते समय भी ईश्वर स्मरण और अत्यधिक श्रद्धा के साथ करें।

विभिन्न गायत्री मंत्र
उपगायत्री मंत्र प्रत्येक एक देवताओं के लिए हैं। अर्थात् ये मंत्र कई प्रकार की शक्ति और चैतन्य से युक्त हैं। गायत्री मंत्र मनपाठ बनाकर नित्य भक्ति पूर्वक जपने पर कई समस्याओं का निवारण होता है ऐसा अनुभव साक्षी कहते हैं। प्रत्येक शक्ति का भिन्न है, प्रत्येक मंत्र का लक्ष्य है वे नीचे वर्णित हैं।

प्रत्येक मंत्र का अलग उद्देश्य और फल होता है

1. श्री बाला गायत्री
ॐ बालाम्बिकायै विद्महे
सदानववर्षायै धीमहि
तन्नो बाला प्रचोदयात्
(बच्चों के रोग शांत होते हैं)

2. श्री सप्तमाता गायत्री
ॐ ब्रह्मशक्त्यै च विद्महे
पीतवर्ण्यै च धीमहि
तन्नो ब्राह्मीः प्रचोदयात्
(त्वचा रोग शांत होते हैं)

3. माहेश्वरी गायत्री
ॐ श्वेतवर्ण्यै च विद्महे
शूलहस्तायै च धीमहि
तन्नो माहेश्वरी प्रचोदयात्
(सर्व मंगल, घर में ऐश्वर्य)

4. गणपति गायत्री
ॐ एकदन्ताय विद्महे
वक्रतुण्डाय धीमहि
तन्नो दन्ती प्रचोदयात्
(इच्छित कार्य सिद्धि)

5. गणपति गायत्री
ॐ लम्बोदराय विद्महे
वक्रतुण्डाय धीमहि
तन्नो दन्तीः प्रचोदयात्
(विघ्न निवारण)

6. सुब्रह्मण्य गायत्री
ॐ सनत्कुमाराय विद्महे
षडाननाय धीमहि
तन्नो स्कन्दः प्रचोदयात्
(बच्चों की उन्नति)

7. सुब्रह्मण्य गायत्री
ॐ तत्पुरुषाय विद्महे
महासेनाय धीमहि
तन्नो षण्मुखः प्रचोदयात्

8. स्कन्द गायत्री
ॐ षडाननाय विद्महे
शक्तिहस्ताय धीमहि
तन्नो स्कन्दः प्रचोदयात्
(सर्व शुभ)

शिव गायत्री
9. ॐ महादेवाय विद्महे
रुद्रमूर्तये धीमहि
तन्नो शिवः प्रचोदयात्
(आयु वृद्धि)

10. ॐ तत्पुरुषाय विद्महे
महादेवाय धीमहि
तन्नो रुद्रः प्रचोदयात्

11. ॐ पंचवक्रताय विद्महे
महादेवाय धीमहि
तन्नो रुद्रः प्रचोदयात्
(दुःख-रोग शमन, परिवार शांति-समृद्धि)

12. ॐ गौरीनाथाय विद्महे
महादेवाय धीमहि
तन्नो शिवः प्रचोदयात्
(दुःख शांति)

13. ॐ सदाशिवाय विद्महे
जटाधराय धीमहि
तन्नो रुद्रः प्रचोदयात्
(आपदाएँ दूर)

देवी गायत्री
14. दुर्गा गायत्री
ॐ गिरिजायै विद्महे
शिवप्रियायै धीमहि
तन्नो दुर्गा प्रचोदयात्
(शत्रु-दृष्टि से रक्षा)

त्रिपुरा देवी गायत्री
15. ॐ ह्रीं ऐं क्लीं
तत्सवितुर्वरेण्यं
भर्गो देवस्य धीमहि ।
धियो यो नः प्रचोदयात् ॥
स्वाहा ॥

16. ॐ ह्रीं ऐं
वेदगर्भे भगवति
धियो यो नः प्रचोदयात् ।
स्वाहा ॥

17. ॐ ऐं त्रिपुरायै विद्महे ।
कामेश्वर्यै धीमहि ।
तन्नः देवी प्रचोदयात् ॥

18. ॐ कात्यायिन्यै च विद्महे
कन्याकुमार्यै च धीमहि
तन्नो दुर्गा प्रचोदयात्
(मांगल्य भाग्य)

19. महाकाली गायत्री
ॐ कालिकायै विद्महे
श्मशानवासिन्यै धीमहि
तन्नो घोरा प्रचोदयात्
(समस्त देवपूजा फल)

20. भद्रकाली गायत्री
ॐ रुद्रसुतायै विद्महे
शूलहस्तायै धीमहि
तन्नो काली प्रचोदयात्

21. अन्नपूर्णा गायत्री
ॐ भगवत्यै विद्महे
महेश्वर्यै धीमहि
तन्नो अन्नपूर्णा प्रचोदयात्
(अभाव व अन्न-दारिद्र्य नाश)

हनुमान
22. पंचमुखी हनुमान गायत्री
ॐ आञ्जनेयाय विद्महे
पंचवक्त्राय धीमहि
तन्नो हनुमत् प्रचोदयात्
(पंचमुखी हनुमान के पंचमुख फल)

23. हनुमान गायत्री
ॐ आञ्जनेयाय विद्महे
महाबलाय धीमहि
तन्नो हनुमान् प्रचोदयात्
(कार्य-व्यवसाय उन्नति)


24. अय्यप्पा / शास्ता गायत्री
ॐ भूतनाथाय विद्महे
महाशास्ताय धीमहि
तन्नो अय्यप्पः प्रचोदयात्
(रोग मुक्ति)

25. शास्ता गायत्री
ॐ भूतनाथाय विद्महे
भवपुत्राय धीमहि
तन्नो शास्ता प्रचोदयात्
अन्य देवता

26. चामुण्डा गायत्री
ॐ कृष्णवर्णायै विद्महे
शूलहस्तायै धीमहि
तन्नो चामुण्डा प्रचोदयात्
(नसों के रोग शमन)

27. वीरभद्र गायत्री
ॐ भस्मायुधाय विद्महे
रक्तनेत्राय धीमहि
तन्नो वीरभद्रः प्रचोदयात्
(कार्य-पदोन्नति)

28. विष्णु गायत्री
ॐ नारायणाय विद्महे
वासुदेवाय धीमहि
तन्नो विष्णुः प्रचोदयात्
(परिवार शांति-समृद्धि)

29. लक्ष्मी गायत्री
ॐ महालक्ष्म्यै विद्महे
विष्णुप्रियायै धीमहि
तन्नो लक्ष्मीः प्रचोदयात्
(धन-ऐश्वर्य-कार्य उन्नति)

29. ॐ पद्मवासिन्यै च विद्महे
पद्मलोचन्यै च धीमहि
तन्नो लक्ष्मीः प्रचोदयात्
(दारिद्र्य नाश)

30. वैष्णवी गायत्री
ॐ श्यामपर्ण्यै च विद्महे
चक्रहस्तायै च धीमहि
तन्नो वैष्णवी प्रचोदयात्
(विषैले जीवों से रक्षा)

31. विष्णुमाया गायत्री
ॐ भूतनाथाय विद्महे
महिषारूढाय धीमहि
तन्नो माया प्रचोदयात्

32. ॐ निरञ्जनाय विद्महे
निरापाशाय धीमहि
तन्नो श्रीनिवासाय प्रचोदयात्
(इच्छा पूर्ति)

33. धन्वन्तरि गायत्री
ॐ आदिवैद्याय विद्महे
आरोग्यानुग्रहाय धीमहि
तन्नो धन्वन्तरिः प्रचोदयात्
(आरोग्य-रोग शमन)

34. दक्षिणामूर्ति गायत्री
ॐ ज्ञानमुद्राय विद्महे
तत्त्वबोधाय धीमहि
तन्नो देवः प्रचोदयात्
(शिक्षा-विद्या उन्नति)

35. कूर्म गायत्री
ॐ कश्यपेशाय विद्महे
महाबलाय धीमहि
तन्नो कूर्मः प्रचोदयात्
(अचानक दुर्घटना से रक्षा)

36. वराही गायत्री
ॐ श्यामलायै च विद्महे
हलहस्तायै च धीमहि
तन्नो वराही प्रचोदयात्

37. वराही गायत्री
ॐ महिषध्वजायै विद्महे
दण्डहस्तायै धीमहि
तन्नो वराही प्रचोदयात्
(शत्रु नाश, उन्नति)

38. वामन गायत्री
ॐ त्रिविक्रमाय विद्महे
विश्वरूपाय च धीमहि
तन्नो वामनः प्रचोदयात्
(संतान भाग्य)

39. हिरण्य गायत्री
ॐ भूवराहाय विद्महे
हिरण्यगर्भाय धीमहि
तन्नो क्रोडः प्रचोदयात्
(परिवार एकता-ऐश्वर्य)

40. नरसिंह गायत्री
ॐ वज्रनखाय विद्महे
तीक्ष्णदंष्ट्राय धीमहि
तन्नो नृसिंहः प्रचोदयात्
(शत्रु भय नाश)

41. ॐ उग्ररूपाय विद्महे
वज्रनागाय धीमहि
तन्नो नृसिंहः प्रचोदयात्
(सर्व विजय)

42. परशुराम गायत्री
ॐ जामदग्न्याय विद्महे
महावीराय धीमहि
तन्नो परशुरामः प्रचोदयात्
(पितृ कृपा)

43. राम गायत्री
ॐ दशरथाय विद्महे
सीतावलभाय धीमहि
तन्नो रामः प्रचोदयात्
(यश-सुरक्षा-ज्ञान)

44. ॐ पीताम्बराय विद्महे
जगन्नाथाय धीमहि
तन्नो रामः प्रचोदयात्
(सर्व ऐश्वर्य)

45. ॐ धर्मरूपाय विद्महे
सत्यव्रताय धीमहि
तन्नो रामः प्रचोदयात्
(सर्व मंगल)

46. कृष्ण गायत्री
ॐ देवकीनन्दनाय विद्महे
वासुदेवाय धीमहि
तन्नो कृष्णः प्रचोदयात्
(कार्य उन्नति)

47. शेष गायत्री
ॐ सहस्रशीर्षाय विद्महे
विष्णुवल्लभाय धीमहि
तन्नो शेषः प्रचोदयात्
(सर्व भय नाश)

48. हयग्रीव गायत्री
ॐ वागीश्वराय विद्महे
हयग्रीवाय धीमहि
तन्नो हंसः प्रचोदयात्
(विद्या गुण)
नियम: प्रातः स्नान के बाद, एकाग्र होकर, कम से कम 9 बार नित्य जप।

49. विष्णु गायत्री
ॐ नारायणाय विद्महे
वासुदेवाय धीमहि
तन्नो विष्णुः प्रचोदयात्
(विष्णुसहस्रनाम तुल्य फल)

50. गरुड़ गायत्री
ॐ पक्षिराजाय विद्महे
स्वर्णपक्ष्याय धीमहि
तन्नो गरुड़ः प्रचोदयात्
(मृत्यु भय नाश)

51. गरुड़ गायत्री
ॐ पक्षिराजाय विद्महे
स्वर्णपक्ष्याय धीमहि
तन्नो गरुड़ः प्रचोदयात्
(मृत्यु भय से रक्षा)

52. ब्रह्मा गायत्री
ॐ परमेश्वराय विद्महे
परतत्त्वाय धीमहि
तन्नो ब्रह्मा प्रचोदयात्
(कृषि-उद्योग उत्पादन वृद्धि)

53. सरस्वती गायत्री
ॐ सरस्वत्यै विद्महे
ब्रह्मपुत्र्यै धीमहि
तन्नो सरस्वती प्रचोदयात्
(विद्या-स्मरण-सृजन)

54. वाणी गायत्री
ॐ वाक्देवत्यै च विद्महे
विरिञ्चपत्नीं च धीमहि
तन्नो वाणीः प्रचोदयात्
(ज्ञान वृद्धि)

55. इन्द्र गायत्री
ॐ सहस्रनेत्राय विद्महे
वज्रास्त्राय धीमहि
तन्नो इन्द्रः प्रचोदयात्
(दुर्घटना से रक्षा)

56. ऐन्द्री गायत्री
ॐ श्यामवर्ण्यै विद्महे
वज्रहस्तायै धीमहि
तन्नो ऐन्द्री प्रचोदयात्
(दांपत्य सामंजस्य)

57. कौमारी गायत्री
ॐ शिखिवाहनायै विद्महे
शक्तिहस्तायै च धीमहि
तन्नो कौमारी प्रचोदयात्
(रक्त रोग शमन)

58. वरुण गायत्री
ॐ जलबिम्बाय विद्महे
नीलपुरुषाय धीमहि
तन्नो वरुणः प्रचोदयात्
(परिवार शांति-ऐश्वर्य)

59. अग्नि गायत्री
ॐ महाज्वलायै विद्महे
अग्निदेवाय धीमहि
तन्नो अग्निः प्रचोदयात्
(ओज-अंग बल)

60. नागराज गायत्री
ॐ नागराजाय विद्महे
पद्महस्ताय धीमहि
तन्नो वासुकिः प्रचोदयात्
(सर्पदोष नाश)

61. नागराज गायत्री
ॐ सर्पराजाय विद्महे
पद्महस्ताय धीमहि
तन्नो वासुकिः प्रचोदयात्

62. अग्नि गायत्री
ॐ महाज्वालाय विद्महे
अग्निमध्याय धीमहि
तन्नो अग्निः प्रचोदयात्

63. यम गायत्री
ॐ सूर्यपुत्राय विद्महे
महाकालाय धीमहि
तन्नो यमः प्रचोदयात्
(मृत्यु भय नाश)

64. कुबेर गायत्री
ॐ यक्षराजाय विद्महे
वैश्रवणाय धीमहि
तन्नो कुबेरः प्रचोदयात्
(धन-ऐश्वर्य वृद्धि)

65. कार्तवीर्यार्जुन गायत्री
ॐ कार्तवीर्याय विद्महे
महाबलाय धीमहि
तन्नो अर्जुनः प्रचोदयात्
(खोई वस्तु की प्राप्ति)

नवग्रह गायत्री
66. सूर्य गायत्री
ॐ भास्कराय विद्महे
महाद्युतिकराय धीमहि
तन्नो आदित्यः प्रचोदयात्
(अधिकार, हृदय-नेत्र स्वास्थ्य)

67. सूर्य गायत्री
ॐ भास्कराय विद्महे
दिवाकराय धीमहि
तन्नो सूर्यः प्रचोदयात्
(रोग शमन)

68. सूर्य गायत्री
ॐ आदित्याय विद्महे
सहस्रकिरणाय धीमहि
तन्नो सूर्यः प्रचोदयात्

69. चन्द्र गायत्री
ॐ अत्रिपुत्राय विद्महे
अमृतमयाय धीमहि
तन्नो सोमः प्रचोदयात्
(मानसिक शांति)

70. चन्द्र / यम संदर्भ
ॐ कृष्णपुत्राय विद्महे
महाकालाय धीमहि
तन्नो यमः प्रचोदयात्
(चिंता-अविश्वास नाश)

71. चन्द्र गायत्री
ॐ क्षीरार्णवाय विद्महे
लक्ष्मीनजाय धीमहि
तन्नो चन्द्रः प्रचोदयात्
(शांति-सौंदर्य)

72. मंगल (कुज) गायत्री
ॐ अंगारकाय विद्महे
भूमिपुत्राय धीमहि
तन्नो भौमः प्रचोदयात्
(उत्साह, मंगल दोष शमन)

73. ॐ अंगारकाय विद्महे
शक्तिहस्ताय धीमहि
तन्नो भौमः प्रचोदयात्

74. ॐ भौमाय विद्महे
महावीराय धीमहि
तन्नो अंगारकः प्रचोदयात्

75. बुध गायत्री
ॐ गजध्वजाय विद्महे
शुकहस्ताय धीमहि
तन्नो बुधः प्रचोदयात्
(बुद्धि-अध्ययन उन्नति)

76. गुरु गायत्री
ॐ ऋषभध्वजाय विद्महे
कृणिहस्ताय धीमहि
तन्नो गुरु प्रचोदयात्
(भाग्य-संतान उन्नति)

77. शुक्र गायत्री
ॐ अश्वध्वजाय विद्महे
धनुर्हस्ताय धीमहि
तन्नो शुक्रः प्रचोदयात्
(विवाह-सुख, गृह-वाहन)

78. शनि गायत्री
ॐ काकध्वजाय विद्महे
खड्गहस्ताय धीमहि
तन्नो मन्दः प्रचोदयात्
(शनि दोष, वात रोग शमन)

79. शनि गायत्री
ॐ काकध्वजाय विद्महे
खड्गहस्ताय धीमहि
तन्नो मन्दः प्रचोदयात्

80. राहु गायत्री
ॐ नागराजाय विद्महे
पद्महस्ताय धीमहि
तन्नो राहुः प्रचोदयात्
(सर्पदोष, त्वचा रोग)

81. केतु गायत्री
ॐ अश्वध्वजाय विद्महे
शूलहस्ताय धीमहि
तन्नो केतुः प्रचोदयात् !!
(विघ्न दूर होते हैं और बिना कारण आने वाली समस्याओं का समाधान होता है)

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Monday, 12 January 2026

Lohri featival

ലോഹ്രി അഗ്നികുണ്ഡങ്ങൾ തെളിച്ച്, ഉത്സവഭക്ഷണം ആസ്വദിച്ച്, പാട്ടും നൃത്തവും നടത്തി, സമ്മാനങ്ങൾ കൈമാറി ആഘോഷിക്കുന്ന ഒരു ഉല്ലാസഭരിതമായ ഉത്സവമാണ്. ഇയ്യിടെ വിവാഹമോ പ്രസവമോ നടന്ന വീടുകളിൽ ലോഹ്രി ആഘോഷങ്ങൾ ഏറെ ആവേശത്തോടെയാണ് നടക്കുന്നത്. വടക്കേ ഇന്ത്യയിലെ ഭൂരിഭാഗം ആളുകളും ലോഹ്രി സ്വന്തം വീടുകളിലായി സ്വകാര്യമായി ആഘോഷിക്കുന്നു; അവിടെ പ്രത്യേക ലോഹ്രി ഗാനങ്ങളോടൊപ്പം പരമ്പരാഗത ആചാരങ്ങൾ നിർവഹിക്കപ്പെടുന്നു.

പാട്ടും നൃത്തവും ഈ ആഘോഷങ്ങളുടെ അവിഭാജ്യഘടകങ്ങളാണ്. പഞ്ചാബിൽ, ആളുകൾ ഏറ്റവും തിളങ്ങുന്ന വസ്ത്രങ്ങൾ ധരിച്ച് അഗ്നികുണ്ഡത്തിനുചുറ്റും കൂടി, പരമ്പരാഗത ജനപദ ഗാനങ്ങളുടെ ഊർജ്ജസ്വലമായ താളങ്ങൾക്ക് അനുസരിച്ച് നൃത്തം ചെയ്യുന്നു. എല്ലാവരും സന്തോഷവും ഉല്ലാസവും നിറഞ്ഞ മനസ്സോടെ ആഘോഷത്തിൽ പങ്കെടുക്കുന്നു. ലോഹ്രി വിരുന്നിൽ സാധാരണയായി മുഖ്യ വിഭവമായി സർസോൻ ദ സാഗ് വിളമ്പാറുണ്ട്.
കർഷകർക്ക് ലോഹ്രിക്ക് വലിയ പ്രാധാന്യമുണ്ട്; ഇത് ശീതകാല അയംക്രമത്തിന്റെ അവസാനം കൂടിയും ദൈർഘ്യമേറിയ പകൽസമയങ്ങളുടെ തുടക്കവുമാണ് സൂചിപ്പിക്കുന്നത്. എന്നാൽ നഗരപ്രദേശങ്ങളിൽ താമസിക്കുന്നവരും ലോഹ്രി ആഘോഷിക്കുന്നു, കാരണം കുടുംബാംഗങ്ങളെയും സുഹൃത്തുകളെയും ഒരുമിച്ച് കൂട്ടിയിണക്കാനുള്ള മികച്ച അവസരമാണ് ഈ ഉത്സവം.
ലോഹ്രി ആഘോഷങ്ങളുടെ കേന്ദ്രബിന്ദുവാണ് അഗ്നികുണ്ഡം തെളിക്കുന്നത്. ഈ പുരാതന പാരമ്പര്യം ചൂടിനെയും സമൃദ്ധിയെയും ശീതകാലത്ത് വീണ്ടും ദൈർഘ്യമേറിയ പകൽസമയങ്ങൾ മടങ്ങിവരുന്നതിനെയും പ്രതീകീകരിക്കുന്നു.

Sunday, 28 December 2025

प्राण ऊर्जा प्राप्त क्यों नहीं हो रही है या क्यों शीघ्र नष्ट हो जाती है?

ऐसा क्यों होता है कि कुछ लोगों को प्राण-शक्ति प्रदान किए जाने के बावजूद भी वे उसे स्वीकार नहीं कर पाते?
और जो स्वीकार कर लेते हैं, उनमें भी कुछ समय बाद वह ऊर्जा क्यों क्षीण हो जाती है?

जीवन-शक्ति को नष्ट करने वाली ऊर्जा: कारण, मनोविज्ञान और व्यावहारिक समाधान

प्राणिक चिकित्सा, प्राण ऊर्जा और ऊर्जा-चिकित्सा के क्षेत्र में यह एक गंभीर और ईमानदार प्रश्न है, जो लंबे समय से साधकों और चिकित्सकों द्वारा पूछा जाता रहा है—

यह विषय केवल आस्था या विश्वास तक सीमित नहीं है।
यह मन, भावनाओं, ऊर्जा-शरीर (आभा और चक्र प्रणाली) तथा कर्म के बीच मौजूद गहरे और सूक्ष्म संबंधों का परिणाम है।
संक्षेप में—
प्राण शक्ति सभी के लिए उपलब्ध है,
लेकिन हर व्यक्ति उसे स्वीकार करने और बनाए रखने में सक्षम नहीं होता।
आइए इसे क्रमबद्ध रूप से समझते हैं।

I. कुछ लोग प्राण ऊर्जा को ग्रहण करने में असमर्थ क्यों होते हैं?
1. मनोवैज्ञानिक प्रतिरोध
कुछ लोगों के मन में अनजाने ही ये विचार सक्रिय रहते हैं—
क्या यह सच में काम करता है?
मुझे इसकी आवश्यकता नहीं है।
ऐसी अचेतन आपत्तियाँ ऊर्जा-शरीर पर सीधा प्रभाव डालती हैं:
आभा सिकुड़ जाती है
चक्र पूरी तरह सक्रिय नहीं हो पाते
परिणामस्वरूप, प्राण ऊर्जा द्वार तक आकर वापस लौट जाती है।

2. गहरा भय, आघात और दमित भावनाएँ
लंबे समय तक संचित भावनाएँ जैसे—
उदासी
क्रोध
अपराध-बोध
निराशा
ये सभी जीवन-प्रवाह के मार्ग में दीवारें बन जाती हैं।
जब तक मन तैयार नहीं होता,
शरीर स्वतः उपचार स्वीकार नहीं कर सकता।

3. अहंकार और नियंत्रण की प्रवृत्ति
यह भाव—
“मुझे किसी की सहायता की आवश्यकता नहीं है।”
यह समझ अक्सर ज्ञान के बिना आती है।
इससे विशेष रूप से—
हृदय चक्र, सौर जाल (मणिपूरक) चक्र कठोर होकर बंद हो जाते हैं।
जहाँ विनम्रता नहीं होती,
वहाँ ऊर्जा प्रवेश नहीं कर पाती।

4. कर्मिक पैटर्न
कुछ जीवन-स्थितियों में कष्ट अनुभव करना कर्मिक प्रक्रिया का हिस्सा होता है।
उपचार असंभव नहीं होता
लेकिन वह अस्थायी या विलंबित हो सकता है
उपचार में देरी ≠ उपचार से इनकार

II. स्वीकार करने के बाद भी ऊर्जा क्यों लीक हो जाती है?
यह इस विषय का सबसे महत्वपूर्ण और व्यावहारिक पक्ष है।
1. आभा में दरार (Energy Leakage)
लगातार—
नकारात्मक विचार
आत्म-दोष
दूसरों की नकारात्मक भावनाओं को अपने ऊपर लेना
आभा को टूटे हुए पात्र जैसा बना देता है।
चाहे जितनी ऊर्जा भरी जाए,
वह बहती ही रहेगी।

2. आधारभूत ज्ञान का अभाव
शरीर-जागरूकता का अभाव
पृथ्वी से जुड़ाव की कमी
यदि मूलाधार चक्र कमजोर है, तो ऊर्जा टिक नहीं पाती।

3. जीवनशैली का उपचार के विरुद्ध होना
यदि दैनिक जीवन में—
अत्यधिक सोच
विषाक्त संबंध
नींद की कमी
नशा या अस्वस्थ भोजन
जारी रहे, तो
रोजमर्रा का जीवन ही उपचार से प्राप्त ऊर्जा को नष्ट कर देता है।

4. प्रार्थना और कृतज्ञता का अभाव
उपचार के बाद यदि—
व्यक्ति स्वयं प्रार्थना नहीं करता
कृतज्ञता का भाव नहीं रखता
तो ऊर्जा स्थिरता न पाकर लौटने लगती है।

III. प्राण ऊर्जा को बनाए रखने के व्यावहारिक उपाय
1. स्वीकार करने की स्पष्ट अनुमति दें
अपने भीतर ईमानदारी से कहें—
“मैं उपचार स्वीकार करता/करती हूँ।”
यह वाक्य आभा के द्वार खोलने की पहली कुंजी है।

2. सरल और स्थिर दिनचर्या
नंगे पाँव धरती पर चलना
श्वास पर ध्यान
पर्याप्त जल सेवन
ये सभी मूलाधार चक्र को सुदृढ़ करते हैं।

3. प्रतिदिन एक मंत्र का जाप
कोई जटिलता आवश्यक नहीं।
जो सहज लगे, वही पर्याप्त है—
🕉️ “सोऽहम्”
या
🕉️ “अहम् ब्रह्मास्मि”
मंत्र एक ध्वनि-कवच है,
जो ऊर्जा को स्थिर और सुरक्षित रखता है।

4. कृतज्ञता का भाव
स्वस्थ अनुभव करने के बाद मन में कहें—
“मुझे यहाँ तक लाने के लिए धन्यवाद।”
कृतज्ञता आभा-मंडल को मजबूत बनाती है।
निष्कर्ष
उपचार कोई एक घटना नहीं है।
उपचार एक अवस्था है।
यदि जीवन-शक्ति देना चिकित्सक का कार्य है,
तो उसे बनाए रखना व्यक्ति की चेतना और जीवनशैली पर निर्भर करता है।
जब आप—
मन को खोलते हैं
अहंकार को ढीला करते हैं
और जीवन के साथ सहयोग करते हैं
तो प्राण ऊर्जा स्वयं स्थिर हो जाती है।

പ്രാണശക്തി സ്വീകരിക്കപ്പെടാത്തതും ചോർന്നുപോകുന്നതും എന്ത് കൊണ്ട്?

പ്രാണശക്തി സ്വീകരിക്കപ്പെടാത്തതും ചോർന്നുപോകുന്നതും – കാരണം, ആത്മശാസ്ത്രം, പ്രായോഗിക മാർഗങ്ങൾ

പ്രാണിക് ഹീലിംഗ്, പ്രാണശക്തി, ഊർജ്ജചികിത്സ തുടങ്ങിയ വിഷയങ്ങളിൽ ദീർഘകാലമായി ചോദിക്കപ്പെടുന്ന ഒരു ഗഹനവും സത്യസന്ധവുമായ ചോദ്യം ഉണ്ട്:

എന്തുകൊണ്ടാണ് ചിലർക്ക് പ്രാണശക്തി കൊടുത്താലും അത് സ്വീകരിക്കപ്പെടാത്തത്?
സ്വീകരിച്ചാലും കുറച്ച് കഴിഞ്ഞാൽ അതു ചോർന്നുപോകുന്നത് എന്തുകൊണ്ട്?

ഇത് വെറും വിശ്വാസത്തിന്റെ പ്രശ്നമല്ല. മനസ്സ്, വികാരം, ഊർജ്ജശരീരം (Aura–Chakra system), കർമ്മം എന്നിവ തമ്മിലുള്ള ആഴമുള്ള ബന്ധത്തിന്റെ ഫലമാണ്.

ചുരുക്കത്തിൽ പറഞ്ഞാൽ —

പ്രാണശക്തി എല്ലാവർക്കും ലഭ്യമാണ്,
പക്ഷേ എല്ലാവർക്കും അത് സ്വീകരിക്കാനും നിലനിർത്താനും കഴിയണമെന്നില്ല.

ഇത് ഇപ്പോൾ ഘട്ടംഘട്ടമായി പരിശോധിക്കാം.

1️⃣ എന്തുകൊണ്ട് ചിലർക്ക് പ്രാണശക്തി സ്വീകരിക്കാൻ കഴിയുന്നില്ല?

1. മാനസിക പ്രതിരോധം (Psychological Resistance)

ചിലരുടെ ഉള്ളിൽ അറിവില്ലാതെ ഉണ്ടാകുന്ന ചോദ്യങ്ങൾ:

“ഇതെല്ലാം സത്യമാണോ?”
“എനിക്കിതൊന്നും വേണ്ടയോ?”

ഇത്തരം അവബോധമില്ലാത്ത എതിർപ്പ് ഉണ്ടെങ്കിൽ:

Aura സ്വയം ചുരുങ്ങും
Chakras പൂർണ്ണമായി തുറക്കുകയില്ല

അപ്പോൾ പ്രാണശക്തി വാതിൽ വരെ വന്ന് മടങ്ങുന്നു.

2. ശക്തമായ ഭയം, ട്രോമ, അടക്കിവെച്ച വികാരങ്ങൾ

ദീർഘകാലമായി അടിഞ്ഞുകൂടിയ:
ദുഃഖം
കോപം
കുറ്റബോധം
നിരാശ
ഇവയെല്ലാം പ്രാണവാഹിനികളെ അടയ്ക്കുന്ന മതിലുകളാണ്.

മനസ്സ് തയ്യാറാകാതെ ശരീരം മാത്രം healing സ്വീകരിക്കില്ല.

3. Ego / Control Pattern

“എനിക്ക് ആരുടെയും സഹായം വേണ്ട”

ഈ ധാരണ അറിവില്ലാതെ തന്നെ:
Heart Chakra
Solar Plexus Chakra
എന്നിവയെ കടുപ്പിക്കുകയും അടയ്ക്കുകയും ചെയ്യുന്നു. സ്വീകരിക്കാനുള്ള വിനയം ഇല്ലെങ്കിൽ പ്രാണം പ്രവേശിക്കില്ല.

4. കർമ്മബന്ധങ്ങൾ (Karmic Pattern)

ചിലർക്കുള്ള കഷ്ടത അനുഭവിച്ചേ തീരേണ്ടതാണ്. അവർക്ക്
Healing താൽക്കാലികമായിരിക്കും

Healing delay ≠ Healing denial
(വൈകിയെത്തുന്ന healing ഇല്ലായ്മയല്ല.)

2️⃣ സ്വീകരിച്ചാലും കുറച്ച് കഴിഞ്ഞാൽ energy ചോർന്നുപോകുന്നതെന്തുകൊണ്ട്?
ഇതാണ് ഈ വിഷയത്തിലെ അത്യന്തം പ്രധാനപ്പെട്ട ഭാഗം.

1. Aura-യിൽ crack / leakage

തുടർച്ചയായ:
നെഗറ്റീവ് ചിന്തകൾ
സ്വയം കുറ്റപ്പെടുത്തൽ
മറ്റുള്ളവരുടെ നെഗറ്റിവിറ്റി ഏറ്റെടുക്കൽ

Aura ഒരു പൊട്ടിയ പാത്രം പോലെയാകും.
പ്രാണം നിറച്ചാലും അത് ഒഴുകിപ്പോകും.

2. Grounding ഇല്ലായ്മ

ശരീരബോധം കുറവ്
ഭൂമിയുമായി ബന്ധമില്ലായ്മ. Root Chakra ദുർബലമാണെങ്കിൽ energy നിലനിൽക്കില്ല.

3. ജീവിതശൈലി Healing-ന് എതിരായാൽ

അമിതമായ overthinking
നെഗറ്റീവ് ബന്ധങ്ങൾ
ഉറക്കക്കുറവ്
ലഹരി, വിഷമയ ഭക്ഷണം

Healing വഴി കിട്ടിയ energy-യെ ദൈനംദിന ജീവിതം തന്നെ കഴുകിക്കളയും.

4. പ്രാർത്ഥനയും നന്ദിയും ഇല്ലായ്മ

Healing സ്വീകരിച്ചിട്ടും:
സ്വയം prayer ഇല്ല
Gratitude ഇല്ല. അപ്പോൾ പ്രാണം സ്ഥിരത തേടി മടങ്ങും.

3️⃣ പ്രാണശക്തി നിലനിർത്താൻ എന്ത് ചെയ്യണം?

1. സ്വീകരിക്കാൻ സമ്മതിക്കുക
ഉള്ളിൽ സത്യമായി പറയുക:
“ഞാൻ healing സ്വീകരിക്കുന്നു.”
ഇത് aura തുറക്കുന്ന ആദ്യ കീയാണ്.

2. ലളിതമായ ദിനചര്യ

ഭൂമിയിൽ നഗ്‌ന്നപാദം ആയി നിൽക്കുക (barefoot grounding)
ശ്വാസബോധം
മതിയായ വെള്ളം
ഇവ Root Chakra ശക്തമാക്കും.

3. ദിവസേന ഒരു മന്ത്രം

നിങ്ങൾക്ക് ഇഷ്ടമുള്ളത് മതിയാകും:

🕉️ “സോഽഹം”
അല്ലെങ്കിൽ
🕉️ “അഹം ബ്രഹ്മാസ്മി”

മന്ത്രം energy-യെ സ്ഥിരപ്പെടുത്തുന്ന ശബ്ദകവചമാണ്.

4. നന്ദി (Gratitude)
Healing കഴിഞ്ഞ് മനസ്സിൽ പറയുക:
“എനിക്ക് ലഭിച്ചതിന് നന്ദി.”
ഇത് aura-യെ seal ചെയ്യുന്നു.

ഉപസംഹാരം
Healing ഒരു സംഭവം അല്ല.
Healing ഒരു നിലയാണ്.

പ്രാണം നൽകുന്നത് healer-ന്റെ പ്രവർത്തിയാണെങ്കിൽ,
പ്രാണം നിലനിർത്തുന്നത് സ്വന്തം ബോധവും ജീവിതശൈലിയും ആണെന്ന് മനസ്സിലാക്കണം.

നിങ്ങളുടെ മനസ്സ് തുറക്കുമ്പോൾ,
പ്രാണശക്തി സ്വയം സ്ഥിരമാകും.

Saturday, 20 December 2025

जीवन के सूक्ष्म आयाम

जीवन के सूक्ष्म आयाम
जीवन केवल परिश्रम से ही आगे नहीं बढ़ता। हर दिखाई देने वाली क्रिया के पीछे एक अदृश्य व्यवस्था कार्य कर रही होती है —

जीवन का संपूर्ण प्रवाह
चेतना → संकल्प → भावना → कंपन → शब्द / कर्म → प्राण प्रवाह → शरीर व मन → परिवेश → कर्म की अभिव्यक्ति → मौन → कृपा — अंतिम बोध

जब इन सूक्ष्म आयामों को समझा जाता है, तब जीवन संघर्ष नहीं रहता; वह एक सहज प्रवाह बन जाता है।
आधुनिक मनोविज्ञान और प्राचीन आत्मविद्या के संगम से प्रस्तुत यह लेख जीवन का एक समग्र दर्शन है।

1. चेतना (चैतन्य) — मूल स्रोत
विचार से पहले, भावना से पहले, कर्म से पहले — चेतना होती है।
जिस पर आप ध्यान देते हैं, वही बढ़ता है
जहाँ चेतना होती है, वहीं ऊर्जा प्रवाहित होती है
अवचेतन जीवन बार-बार पीड़ा रचता है
चेतना विचार नहीं है — वह शांत साक्षीभाव है।
जीवन परिस्थितियाँ बदलने से नहीं, चेतना गहराने से बदलता है।

2. संकल्प (उद्देश्य) — दिशा
चेतना को रूप देने का कार्य संकल्प करता है।
वही कर्म + अलग संकल्प = अलग परिणाम
संकल्प अवचेतन मन को प्रोग्राम करता है
स्पष्ट संकल्प मन-शरीर-ऊर्जा को एक करता है
संकल्प के बिना ऊर्जा बिखरती है;
संकल्प के साथ छोटा प्रयास भी शक्तिशाली बनता है।

3. भावना (भाव) — बीज ऊर्जा
भाव जीवन का भावनात्मक चार्ज है।
प्रेम ऊर्जा को विस्तार देता है
भय ऊर्जा को संकुचित करता है
कृतज्ञता शांति लाती है
द्वेष विषाक्तता पैदा करता है
दोहराई जाने वाली भावनाएँ स्वभाव बनती हैं,
और स्वभाव ही आगे चलकर भाग्य बनता है।
जैसा भाव, वैसा ही भव।

4. कंपन (स्पंदन) — ऊर्जा क्षेत्र
सब कुछ कंपन करता है — विचार, भाव, शब्द, कोशिकाएँ।
उच्च कंपन: स्पष्टता, स्वास्थ्य, सामंजस्य
निम्न कंपन: भ्रम, रोग, संघर्ष
जीवन वह नहीं देता जो आप चाहते हैं,
बल्कि वह आकर्षित करता है जो आप कंपन करते हैं।

5. शब्द / ध्वनि (वाक् / नाद) — सक्रियकरण
शब्द सृजन-शक्ति है।
शब्दों में संकल्प, भावना और कंपन समाहित होते हैं
कठोर शब्द ऊर्जा का क्षय करते हैं
सत्य और कोमल शब्द प्राण को स्थिर करते हैं
मंत्र विश्वास से नहीं,
ध्वनि-संरचना की शुद्धता से कार्य करते हैं।
मौन — शब्द की परम अवस्था है।

6. श्वास और प्राण — जीवन शक्ति
प्राण जीवन को सक्रिय रखने वाली शक्ति है।
दुर्बल प्राण → भय, थकान, भ्रम
संतुलित प्राण → आत्मविश्वास, अंतःप्रज्ञा, उपचार-शक्ति
श्वास शरीर और मन के बीच सेतु है।
श्वास को नियंत्रित करने से
भावनाएँ, विचार और स्वास्थ्य प्रभावित होते हैं।

7. शरीर — साधन
शरीर चेतना से अलग नहीं; वह उसका वाहन है।
तनाव ऊर्जा को रोकता है
शांति प्रवाह को पुनः स्थापित करती है
देह-भंगिमा मानसिक अवस्था को प्रभावित करती है
नींद प्राण को नवीनीकृत करती है
योग, गति और विश्राम —
सब ऊर्जा-स्वच्छता ही हैं।

8. मन — प्रोसेसर
मन संसार के अनुभवों को संसाधित करता है।
अतिचिंतन ऊर्जा को चूसता है
स्थिरता स्पष्टता देती है
अनुशासन मन को शांत करता है
लक्ष्य मन को नष्ट करना नहीं,
बल्कि उसे चेतना का सेवक बनाना है।

9. स्मृति और कर्म (संस्कार) — पृष्ठभूमि प्रोग्राम
अतीत के अनुभव ऊर्जा-चिह्न छोड़ते हैं।
आघात ऊर्जा को जकड़ देता है
अपूर्ण भावनाएँ पुनरावृत्ति रचती हैं
उपचार = मुक्त करना
कर्म दंड नहीं;
वह अवचेतन आदत है।
चेतना कर्म-चक्र को तोड़ती है।

10. परिवेश (देश-काल-पात्र) — प्रभाव
स्थान, समय और संगति जीवन को आकार देते हैं।
शुद्ध स्थान स्पष्टता देते हैं
प्रकृति संतुलन लौटाती है
लोग कंपन को प्रभावित करते हैं
पोषक परिवेश का चयन करें।

11. अनुशासन (अभ्यास) — स्थिरता
प्रेरणा आती-जाती है; अभ्यास बना रहता है।
दैनिक अभ्यास आंतरिक शक्ति बढ़ाता है
छोटा पर नियमित प्रयास बड़ा परिवर्तन लाता है
अनुशासन बल नहीं,
स्व-सम्मान है।

12. मौन — एकीकरण
मौन बिखरी ऊर्जा को समेटता है।
मौन शांति देता है
मौन सत्य प्रकट करता है
मौन प्राण को पुनर्स्थापित करता है
शब्दों के बीच भी
अंदर की निस्तब्धता ही सच्चा मौन है।

13. समर्पण और कृपा — गुणक
कृपा प्रयास से परे है।
अहं के शमन से जीवन बहने लगता है
समर्पण कमजोरी नहीं, विश्वास है
जब प्रयास और विनय एक होते हैं,
तभी कृपा उतरती है।

जीवन को जीतना नहीं है —
उसके साथ सुर में बहना है।
जब चेतना स्पष्ट हो,
संकल्प शुद्ध हो,
भावनाएँ संतुलित हों,
और प्राण स्वतंत्र रूप से बहें —
तब जीवन स्वाभाविक रूप से अर्थपूर्ण, स्वस्थ और शांत हो जाता है।

अंदर का संसार संतुलित होते ही
बाहर का संसार स्वयं व्यवस्थित हो जाता है।
बोधपूर्वक जीने पर, जीवन स्वयं एक साधना बन जाता है।
— अनूप मेनन, 19:00