ऐसा क्यों होता है कि कुछ लोगों को प्राण-शक्ति प्रदान किए जाने के बावजूद भी वे उसे स्वीकार नहीं कर पाते?
और जो स्वीकार कर लेते हैं, उनमें भी कुछ समय बाद वह ऊर्जा क्यों क्षीण हो जाती है?
जीवन-शक्ति को नष्ट करने वाली ऊर्जा: कारण, मनोविज्ञान और व्यावहारिक समाधान
प्राणिक चिकित्सा, प्राण ऊर्जा और ऊर्जा-चिकित्सा के क्षेत्र में यह एक गंभीर और ईमानदार प्रश्न है, जो लंबे समय से साधकों और चिकित्सकों द्वारा पूछा जाता रहा है—
यह विषय केवल आस्था या विश्वास तक सीमित नहीं है।
यह मन, भावनाओं, ऊर्जा-शरीर (आभा और चक्र प्रणाली) तथा कर्म के बीच मौजूद गहरे और सूक्ष्म संबंधों का परिणाम है।
संक्षेप में—
प्राण शक्ति सभी के लिए उपलब्ध है,
लेकिन हर व्यक्ति उसे स्वीकार करने और बनाए रखने में सक्षम नहीं होता।
आइए इसे क्रमबद्ध रूप से समझते हैं।
I. कुछ लोग प्राण ऊर्जा को ग्रहण करने में असमर्थ क्यों होते हैं?
1. मनोवैज्ञानिक प्रतिरोध
कुछ लोगों के मन में अनजाने ही ये विचार सक्रिय रहते हैं—
क्या यह सच में काम करता है?
मुझे इसकी आवश्यकता नहीं है।
ऐसी अचेतन आपत्तियाँ ऊर्जा-शरीर पर सीधा प्रभाव डालती हैं:
आभा सिकुड़ जाती है
चक्र पूरी तरह सक्रिय नहीं हो पाते
परिणामस्वरूप, प्राण ऊर्जा द्वार तक आकर वापस लौट जाती है।
2. गहरा भय, आघात और दमित भावनाएँ
लंबे समय तक संचित भावनाएँ जैसे—
उदासी
क्रोध
अपराध-बोध
निराशा
ये सभी जीवन-प्रवाह के मार्ग में दीवारें बन जाती हैं।
जब तक मन तैयार नहीं होता,
शरीर स्वतः उपचार स्वीकार नहीं कर सकता।
3. अहंकार और नियंत्रण की प्रवृत्ति
यह भाव—
“मुझे किसी की सहायता की आवश्यकता नहीं है।”
यह समझ अक्सर ज्ञान के बिना आती है।
इससे विशेष रूप से—
हृदय चक्र, सौर जाल (मणिपूरक) चक्र कठोर होकर बंद हो जाते हैं।
जहाँ विनम्रता नहीं होती,
वहाँ ऊर्जा प्रवेश नहीं कर पाती।
4. कर्मिक पैटर्न
कुछ जीवन-स्थितियों में कष्ट अनुभव करना कर्मिक प्रक्रिया का हिस्सा होता है।
उपचार असंभव नहीं होता
लेकिन वह अस्थायी या विलंबित हो सकता है
उपचार में देरी ≠ उपचार से इनकार
II. स्वीकार करने के बाद भी ऊर्जा क्यों लीक हो जाती है?
यह इस विषय का सबसे महत्वपूर्ण और व्यावहारिक पक्ष है।
1. आभा में दरार (Energy Leakage)
लगातार—
नकारात्मक विचार
आत्म-दोष
दूसरों की नकारात्मक भावनाओं को अपने ऊपर लेना
आभा को टूटे हुए पात्र जैसा बना देता है।
चाहे जितनी ऊर्जा भरी जाए,
वह बहती ही रहेगी।
2. आधारभूत ज्ञान का अभाव
शरीर-जागरूकता का अभाव
पृथ्वी से जुड़ाव की कमी
यदि मूलाधार चक्र कमजोर है, तो ऊर्जा टिक नहीं पाती।
3. जीवनशैली का उपचार के विरुद्ध होना
यदि दैनिक जीवन में—
अत्यधिक सोच
विषाक्त संबंध
नींद की कमी
नशा या अस्वस्थ भोजन
जारी रहे, तो
रोजमर्रा का जीवन ही उपचार से प्राप्त ऊर्जा को नष्ट कर देता है।
4. प्रार्थना और कृतज्ञता का अभाव
उपचार के बाद यदि—
व्यक्ति स्वयं प्रार्थना नहीं करता
कृतज्ञता का भाव नहीं रखता
तो ऊर्जा स्थिरता न पाकर लौटने लगती है।
III. प्राण ऊर्जा को बनाए रखने के व्यावहारिक उपाय
1. स्वीकार करने की स्पष्ट अनुमति दें
अपने भीतर ईमानदारी से कहें—
“मैं उपचार स्वीकार करता/करती हूँ।”
यह वाक्य आभा के द्वार खोलने की पहली कुंजी है।
2. सरल और स्थिर दिनचर्या
नंगे पाँव धरती पर चलना
श्वास पर ध्यान
पर्याप्त जल सेवन
ये सभी मूलाधार चक्र को सुदृढ़ करते हैं।
3. प्रतिदिन एक मंत्र का जाप
कोई जटिलता आवश्यक नहीं।
जो सहज लगे, वही पर्याप्त है—
🕉️ “सोऽहम्”
या
🕉️ “अहम् ब्रह्मास्मि”
मंत्र एक ध्वनि-कवच है,
जो ऊर्जा को स्थिर और सुरक्षित रखता है।
4. कृतज्ञता का भाव
स्वस्थ अनुभव करने के बाद मन में कहें—
“मुझे यहाँ तक लाने के लिए धन्यवाद।”
कृतज्ञता आभा-मंडल को मजबूत बनाती है।
निष्कर्ष
उपचार कोई एक घटना नहीं है।
उपचार एक अवस्था है।
यदि जीवन-शक्ति देना चिकित्सक का कार्य है,
तो उसे बनाए रखना व्यक्ति की चेतना और जीवनशैली पर निर्भर करता है।
जब आप—
मन को खोलते हैं
अहंकार को ढीला करते हैं
और जीवन के साथ सहयोग करते हैं
तो प्राण ऊर्जा स्वयं स्थिर हो जाती है।