Thursday, 16 April 2026

हस्तिनापुर

आज मेरठ में हूँ। यह एक ऐसी पवित्र भूमि है जहाँ रामायण और महाभारत— दोनों की कथाएँ एक साथ जीवंत होती हैं।

रावण की पत्नी मंदोदरी के पिता मायासुर द्वारा शासित मायाराष्ट्र भी यहीं माना जाता है। साथ ही, कौरव और पांडव जहाँ पले-बढ़े, और द्रौपदी चीर हरण की घटना जिस हस्तिनापुर के राजमहल में हुई — वह भी आज के मेरठ क्षेत्र से जुड़ा हुआ है।

अहल्या द्रौपदी कुंती तारा मंदोदरी तथा।
पंचकन्या स्मरेन्नित्यं महापातक नाशनम्॥

पंचकन्याओं के रूप में प्रसिद्ध —
अहल्या (बोध/awakening),
द्रौपदी (समर्पण/surrender),
कुंती (धैर्य/patience),
तारा (विवेक/wisdom),
और मंदोदरी (धर्म/righteousness) — इन पाँचों में से मंदोदरी का संबंध मेरठ से माना जाता है।

कहते हैं कि सबसे शक्तिशाली और ज्ञानी पति पाने की कामना से मंदोदरी ने यहाँ बिलेश्वर महादेव मंदिर में तपस्या और पूजा की थी।

दिल्ली से लगभग 80 किमी दूर स्थित मेरठ के आसपास महाभारत से जुड़े अनेक ऐतिहासिक और पौराणिक स्थल हैं — जैसे इंद्रप्रस्थ (आज का दिल्ली), कुरुक्षेत्र जहाँ महायुद्ध हुआ, और बरनावा/बागपत (प्राचीन वर्णावत) जहाँ पांडवों को जलाके मारने केलिए कौरवों ने लक्षगृह बनाया गया था।

लगभग 5000 वर्ष पुराने हस्तिनापुर के स्पष्ट अवशेष आज भले ही दिखाई नहीं देते, लेकिन वहाँ एक विशाल वटवृक्ष आज भी मौजूद है। मान्यता है कि जब पांडवों ने जुए में द्रौपदी को हार दिया और उसका चीरहरण किया जा रहा था, तब श्री कृष्ण ने इसी स्थान से उसकी लाज बचाने के लिए उसे अनंत वस्त्र प्रदान किए थे।

उस वटवृक्ष के पास एक आश्रम भी है। जब मैं और डॉक्टर खिवालिया साहब वहाँ पहुँचे, तो तीन संन्यासी वहाँ उपस्थित थे। हम कुछ समय उनके साथ बैठे, बातचीत की, चाय पी, और उस वृक्ष की तस्वीरें लेकर आगे बढ़ गए।

वटवृक्ष से लगभग 150 मीटर की दूरी पर वह स्थान है जहाँ कौरव और पांडवों के बीच जुए का खेल हुआ था — राजदरबार। लगभग 2–3 किलोमीटर लंबा ऊँचा क्षेत्र ही हस्तिनापुर के प्राचीन राजमहल का हिस्सा माना जाता है।

यात्रा के दौरान रास्ते में मिलने वाले कुत्तों को भोजन कराने की आदत के कारण हम एक दुकान पर बिस्कुट लेने रुके। वहाँ दुकानदारों ने बंदरों के लिए भुने चने और मिठाई लेने की सलाह दी, तो हमने वह भी एक-एक किलो खरीद लिया और आगे बढ़े।

हालाँकि महल आज स्पष्ट रूप से दिखाई नहीं देता, लेकिन पूरे क्षेत्र को जम्बूद्वीप के नाम से जाना जाता है, जहाँ बहुत सारे सुंदर जैन मंदिरे बने हुए हैं।

इसके बाद हमने राजपरिवार की रानियों द्वारा पूजित शिव और काली मंदिरों के दर्शन किए। वहाँ पूजा-अर्चना कर, रास्ते में बंदरों और कुत्तों को भोजन कराते हुए आगे बढ़ते रहे।

करीब 2 किलोमीटर आगे जाकर हमने भीष्म पितामह के स्नान और ध्यान से जुड़ा गंगा नदी का तट भी देखा। वहाँ से हम अमरोहा की ओर लौट गए।

वापसी के दौरान हमने शुक्रताल का भी दर्शन किया, जहाँ मान्यता है कि परीक्षित (अभिमन्यु के पुत्र) ने श्राप मिलने के बाद अपने जीवन के अंतिम सात दिन तपस्या में बिताए थे। उस अद्भुत अनुभव को अगले ब्लॉग में साझा करूँगा।

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